तिरुक्कुरल - सूक्तिसौरभम्
ग्रन्थ परिचय
- प्रणेता: तिरुवल्लुवर
- रचनाकाल: ईस्वीयाब्दस्य प्रथमशताब्दी
- भाषा: तमिल
- संरचना: धर्म, अर्थ, काम - तीन भागों में विभक्त
- पद्यसंख्या: 1330
मुख्य विचार
- विद्याधन: धन का सर्वोत्तम रूप, जो नित्य वर्धित होता है।
- आचार: सदाचार का पालन करना आवश्यक है।
- वाणी: मधुर वाणी से सभी संतुष्ट होते हैं।
महत्वपूर्ण श्लोक
- पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
- अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
- त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत।
अध्ययन प्रश्न
- प्रश्न 1: धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति?
- प्रश्न 2: बुद्धिमान् नरः किम् इच्छति?
- प्रश्न 3: विद्वांसः लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिता:?