व्याकरणवीथि
अभ्यासकार्य
प्रश्न 1
अधोलिखितपदेभ्यः आगमवर्णान्, आदेशवर्णान् वा स्पष्टीकृत्य पृथक् कुरुत—
यथा— वृक्ष + छाया - वृक्षच्छाया -
- च् (आगम: )
यदि + अपि - यद्यपि - य् (आदेश:)
- इति+ आदि - इत्यादि
- तरु+ छाया - तरुच्छाया
- अनु + छेद: - अनुच्छेद:
- अनु+ इच्छति - अन्विच्छति
प्रश्न 2
अधोलिखिततालिकात: पदसंज्ञकपदानि पृथक् कृत्वा लिखत—
सः, पठति, हरि, दृश्, हसामि, चल, मुनी, चलति, ते।
प्रश्न 3
अधोलिखिततालिकायां प्रदत्तपदेषु संयोगस्य उदाहाणानि पृथक् कृत्वा लिखत—
महेश:, उष्ण:, वागीशः, महत्त्वम्, सज्जन:, क्लेशः, पावकः।
संज्ञा एवं परिभाषा प्रकरण
संज्ञा
व्यावहारिक सुविधा के लिए प्रत्येक व्यक्ति या पदार्थ को किसी न किसी नाम से अभिहित किया जाता है। इसी नाम को संज्ञा भी कहते हैं।
आगम
किसी वर्ण के साथ जब दसरा वर्ण पास आकर बैठकर उससे संयुक्त हो जाता है, तब वह आगम कहलाता है।
उदाहरण: वृक्ष + छाया = वृक्षच्छाया।
आदेश
किसी वर्ण को हटाकर जब कोई दूसरा वर्ण उसके स्थान पर शत्रु की भाँति आ बैठता है तो वह आदेश कहलाता है।
उदाहरण: यदि + अपि = यद्यपि।
उपधा
किसी शब्द के अन्तिम वर्ण से पूर्व (वर्ण) को उपधा कहते हैं।
उदाहरण: चिन्त् में 'त्' अंतिम वर्ण है और उससे पूर्व 'न्' उपधा है।
पद
संज्ञा के साथ सु, औ, जस् आदि नाम पदों में आने वाले 21 प्रत्यय एवं तिप्, तस्, झि आदि क्रियापदों में आने वाले 18 प्रत्यय विभक्ति संज्ञक हैं।
निष्ठा
'क्त' और 'क्तवत्' प्रत्ययों को निष्ठा कहते हैं।
उदाहरण: गत:, गतवान्।
विकरण
धातु और तिङ् प्रत्ययों के बीच में आने वाले शप्, श्यन्, श्नु आदि प्रत्यय विकरण कहलाते हैं।
संयोग
संस्कृत में 'संयोग' एक महत्त्वपूर्ण संज्ञा के रूप में प्राप्त होता है।
उदाहरण: राम: उद्यानं गच्छति।
संहिता
वर्णों के अत्यन्त सामीप्य अर्थात् व्यवधान रहित सामीप्य को संहिता कहते हैं।
उदाहरण: वाक् + ईश: = वागीश:।
सम्प्रसारण
यण् के स्थान पर इक् के प्रयोग को सम्प्रसारण कहते हैं।
उदाहरण: यज्-इज् → इज्यते, वच्-उच् → उच्यते。