वर्णोच्चारण-शिक्षा १
महत्वपूर्ण बिंदु
- उच्चारण के लिए आवश्यक तत्व:
- स्थानम् (Place of Articulation)
- करणम् (Tool of Articulation)
- आभ्यन्तर-प्रयत्नः (Internal Effort)
स्थानानि
- कण्ठः (Throat)
- तालु (Palate)
- मूर्धा (Crown)
- दन्तः (Teeth)
- ओष्ठः (Lips)
- नासिका (Nasal Cavity)
करणानि
- जिह्वा (Tongue) विभिन्न भागों में कार्य करती है:
- जिह्वा-मध्यः (Middle of Tongue)
- जिह्वा-उपाग्रः (Near Tip of Tongue)
- जिह्वा-अग्रः (Tip of Tongue)
वर्णों का वर्गीकरण
- स्वराः (Vowels): स्वतन्त्र रूप से उच्चारित होते हैं।
- व्यञ्जनानि (Consonants): स्वर के प्रति पराश्रित होते हैं।
उच्चारण प्रक्रिया
- नाभि-प्रदेश में मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं।
- उरः श्वासकोश में वायु को ऊर्ध्व की ओर धकेलता है।
- वायु कण्ठ-बिल में पहुँचता है।
- वायु आस्य में प्रविष्ट होकर वर्णरूप में प्रकट होता है।
उदाहरण
- मुरली (Flute) का उपयोग उच्चारण में स्थान और करण का उदाहरण है।
परिभाषाएँ
- स्वरः: स्वयं राजन्ते इति स्वराः।
- व्यञ्जनम्: उच्चारणार्थं यः वर्णः अचं प्रति पराश्रितः भवति।