मीरा का जीवन और काव्य
जीवन परिचय
- जन्म: जोधपुर के चोकड़ी (कुड़की) गाँव में 1503 में
- विवाह: मेवाड़ के महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज से 13 वर्ष की उम्र में
- दुखद जीवन: माँ, पति, पिता और श्वसुर का निधन
- समर्पण: घर-परिवार त्यागकर वृंदावन में गिरधर गोपाल कृष्ण के प्रति समर्पित
भक्ति आंदोलन में स्थान
- विशिष्ट स्थान: मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की आध्यात्मिक प्रेरणा
- कृतियाँ: कुल सात-आठ कृतियाँ उपलब्ध
- भक्ति भाव: दैन्य और माधुर्यभाव
भाषा और शैली
- भाषा: राजस्थानी, ब्रज, गुजराती का मिश्रण
- प्रभाव: योगियों, संतों और वैष्णव भक्तों का सम्मिलित प्रभाव
पदों का सारांश
- पहला पद: हरि से पीड़ा हरने की विनती, द्रोपदी की लाज की रक्षा
- दूसरा पद: श्रीकृष्ण की चाकरी की इच्छा, गिरधर गोपाल के प्रति समर्पण
काव्य सौंदर्य
- उदाहरण: "हरि आप हरो जन री भीर। द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।"
- भाव: भक्त की पीड़ा और आराध्य के प्रति प्रेम
कार्य
- मीरा के पदों का संकलन और भित्ति पत्रिका पर लगाना
- अन्य अवतारों के बारे में जानकारी प्राप्त करना और चार्ट बनाना