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kabir-ke-dohe

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kabir-ke-dohe

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Summary

कबीर के दोहे

प्रमुख दोहे

  • साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
    • जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।
  • बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
    • पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।
  • गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
    • बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।
  • अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
    • अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
  • ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
    • औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।
  • निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
    • बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।
  • साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
    • सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।
  • कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
    • जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।

महत्वपूर्ण संदेश

  • सत्य का पालन: सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।
  • आलोचना का महत्व: आलोचकों को पास रखना चाहिए, वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
  • मधुर वाणी: मधुर वाणी बोलने से मानसिक शांति मिलती है।
  • संतुलन का महत्व: हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

जीवन कौशल

  • समय का सदुपयोग करना
  • दूसरों के काम आना
  • परिश्रम और लगन से काम करना
  • सभी के प्रति उदार रहना

निष्कर्ष

कबीर के दोहे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरी समझ प्रदान करते हैं और हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

Learning Objectives

  • Understand the significance of Kabir's couplets in daily life.
  • Analyze the impact of speech and silence as conveyed in the couplets.
  • Discuss the importance of truthfulness and the consequences of falsehood.
  • Explore the role of a guru and the value of guidance in personal development.
  • Reflect on the influence of companionship and its effects on behavior and character.
  • Recognize the importance of moderation in speech and actions.
  • Appreciate the poetic structure and literary devices used in Kabir's couplets.

Detailed Notes

कबीर के दोहे

1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।

अर्थ:

  • गुरु का महत्व
  • ज्ञान का महत्व
  • भक्ति का महत्व

2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।

संदेश:

  • हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है

3. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

निष्कर्ष:

  • सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है

4. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

जीवन कौशल:

  • दूसरों के काम आना
  • सभी के प्रति उदार रहना

5. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।

लाभ:

  • दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है

6. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

दृष्टिकोण:

  • आलोचकों को पास रखना चाहिए

7. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

प्रतीक:

  • विवेक और सूझबूझ का

8. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।

संदेश:

  • संगति का असर जीवन पर पड़ता है

चर्चा के लिए प्रश्न:

  1. क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपको सही दिशा दिखाने में सहायता की हो?
  2. क्या कभी किसी ने आपकी कमियों या गलतियों के विषय में बताया है जिनमें आपको सुधार करने का अवसर मिला हो?
  3. क्या आपने कभी अनुभव किया है कि आपकी संगति आपके विचारों और आदतों को प्रभावित करती है?

Exam Tips & Common Mistakes

Common Mistakes and Exam Tips

Common Pitfalls

  • Misinterpretation of Dohe: Students often misinterpret the meanings of Kabir's dohe, leading to incorrect answers.
  • Overgeneralization: Some students apply the teachings of dohe too broadly without considering the context.
  • Neglecting Discussion: Failing to discuss interpretations with peers can lead to a lack of understanding.

Tips for Avoiding Mistakes

  • Engage in Group Discussions: Discuss your interpretations of dohe with classmates to gain different perspectives.
  • Use Resources: Utilize dictionaries, the internet, or teachers to clarify meanings and contexts of dohe.
  • Practice Recitation: Recite dohe aloud to better grasp their rhythm and meaning, which can aid in retention and understanding.
  • Focus on Key Themes: Pay attention to the central themes of balance, truth, and the impact of words as emphasized in the dohe.
  • Reflect on Personal Experiences: Relate the teachings of the dohe to personal experiences to enhance understanding and retention.

Practice & Assessment

Multiple Choice Questions

A. ताकि वह सब कुछ ग्रहण कर ले।

B. ताकि वह सबको डाँट सके।

C. ताकि वह अच्छी बातों को ग्रहण कर ले और बुरी बातों को त्याग दे।

D. ताकि वह सबसे अलग रहे।

Correct Answer: C

Solution: सूप सार (अच्छी चीज़) को बचा लेता है और थोथा (बुरी चीज़) को उड़ा देता है। साधु को भी यही गुण अपनाना चाहिए।

A. गुरु को

B. गोविंद (ईश्वर) को

C. माता-पिता को

D. इनमें से कोई नहीं

Correct Answer: A

Solution: कवि ने गुरु को अधिक महत्त्व दिया है क्योंकि गुरु ने ही गोविंद तक पहुँचने का रास्ता बताया है।

A. डर जाना

B. अहंकार (घमंड) त्यागना

C. सोच विचार न करना

D. क्रोध करना

Correct Answer: B

Solution: ‘आपा’ का अर्थ अहंकार या घमंड होता है। कबीर के अनुसार ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो मन का अहंकार दूर कर दे।

A. दूसरों को और स्वयं को शांति मिलती है।

B. समाज में सम्मान मिलता है।

C. धन की प्राप्ति होती है।

D. केवल दूसरों को प्रसन्नता मिलती है।

Correct Answer: A

Solution: दोहे के अनुसार, मीठी बानी औरन को सीतल करै (दूसरों को शीतल करती है) और आपहुँ सीतल होय (स्वयं को भी शांत करती है)।

A. सूप (छाज) के समान

B. हाथी के समान

C. सूर्य के समान

D. मिट्टी के समान

Correct Answer: A

Solution: दोहे के अनुसार, 'साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय' अर्थात साधु को सूप (छाज/विनोइंग बास्केट) के स्वभाव जैसा होना चाहिए।

A. तेरहवीं शताब्दी

B. पंद्रहवीं शताब्दी

C. चौदहवीं शताब्दी

D. सोलहवीं शताब्दी

Correct Answer: C

Solution: कवि परिचय खंड के अनुसार, 'माना जाता है कि कबीर का जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी में हुआ था

A. कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

B. जैसी संगति होती है, वैसा ही फल मिलता है।

C. केवल धन की प्राप्ति होती है।

D. मनुष्य सदा प्रसन्न रहता है।

Correct Answer: B

Solution: दोहे के अनुसार, 'जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय' अर्थात जैसी संगत होगी, मनुष्य को वैसा ही फल प्राप्त होगा।

A. बोलने का

B. चुप रहने का

C. बरसने और धूप का

D. उपरोक्त सभी का

Correct Answer: D

Solution: दोहे के अनुसार, 'अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।' अर्थात इन सभी का अति (अत्यधिक) होना बुरा है।

A. सत्य

B. ईश्वर

C. शरीर

D. ज्ञान

Correct Answer: A

Solution: ‘साँच’ शब्द का अर्थ सत्य या सच्चाई है।

A. ज्ञान की प्राप्ति

B. धन की प्राप्ति

C. सामाजिक सम्मान

D. बिना पानी-साबुन के स्वभाव निर्मल होता है

Correct Answer: D

Solution: आलोचक के पास रहने से 'बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय' अर्थात वह बिना किसी बाहरी साधन के हमारे स्वभाव को शुद्ध कर देता है।