वाङ्मनः प्राणस्वरूपम्
सारांश
- यह पाठ छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय के पञ्चम खण्ड पर आधारित है।
- मन, प्राण और वाक् (वाणी) के संदर्भ में रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है।
- उपनिषद् के गूढ़ प्रसंग को आरुणि एवं श्वेतकेतु के संवाद के माध्यम से समझाया गया है।
- ज्ञान प्राप्ति के तीन उपाय बताए गए हैं, जिनमें परिप्रश्न भी शामिल है।
- गुरुसेवा करने वाला शिष्य वाणी, मन और प्राण के विषय में प्रश्न पूछता है और आचार्य उत्तर देते हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु
- मन अन्नमय है, प्राण आपोमय है, और वाणी तेजोमयी है।
- भोजन से प्राप्त तेज तीन प्रकार का होता है: स्थविष्ठ भाग अस्थि, मध्य भाग मज्जा, और लघुतम भाग वाणी।
- सात्विक भोजन से मन सात्विक होता है, जबकि दूषित भावना से अर्जित अन्न तामस होता है।
- जल को जीवन कहा गया है और प्राण जलमय होता है।
- वाणी को तैल और घृत के भक्षण से विशद किया जाता है।
संवाद
- आरुणि और श्वेतकेतु के बीच संवाद में ज्ञान का आदान-प्रदान होता है।
- आरुणि अपने पुत्र को उपदेश देते हैं कि खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का होता है।
- श्वेतकेतु प्रश्न पूछते हैं और आरुणि उत्तर देते हैं, जैसे कि "मन किस प्रकार का होता है?"
उपनिषद का महत्व
- छान्दोग्योपनिषद् उपनिषद साहित्य का प्राचीन और प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
- यह आत्मज्ञान और उपयोगी कार्यों का सम्यक् वर्णन करता है।
- इसमें 'तत्त्वमसि' का विस्तार से विवेचन किया गया है।